गयाजी में पिंडदान का क्या है महत्व ?
देश-दुनिया में बिहार के गयाजी की मोक्ष नगरी के रूप में प्रसिद्धि है। यहां हर साल पितृपक्ष मेला लगता हैण् जिसमें देश के कोने-कोने के अलावा विदेश से भी लाखों तीर्थयात्री आते हैं पितरों को मोक्ष दिलाने के लिए और पिंडदान करने के लिए। बताया जाता है कि यहां स्वंय भगवान विष्णु पितृदेवता के रूप में विराजमान हैं। यहां पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है।
आखिर गयाजी को मोक्ष की धरती क्यों कहा गया है। दरअसल, इसके पीछे एक पौराणिक कथा है जो सतयुग से जुड़ी है। सतयुग में गयासुर नामक एक असुर (राक्षस) था। असुर कुल में जन्म लेने के बावजूद वह धार्मिक, दयालु और भगवान विष्णु का परम भक्त था। उसने एक बार कोलाहल पर्वत पर जाकर तपस्या शुरू की। पौराणिक ग्रंथों और महाभारत में वर्णित यह एक सचेतन पर्वत है। वहां उसने एक पैर पर खड़ा होकर वर्षों तक भगवान विष्णु की आराधना की। गयासुर की तपस्या में इतनी तेज थी कि उससे तीनों लोक जलने लगे। इंद्र सहित कई देवता इससे घबरा गए। देवताओं को परेशान देख भगवान विष्णु स्वयं गयासुर के सामने प्रकट हुए। उन्होंने कहा कि मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हुआ, मुझसे वर मांगो। भगवान विष्णु को सामने देख गयासुर ने कहा कि प्रभु! मेरा शरीर इतना पवित्र हो जाए कि इसे जो जीव देखे या छू ले वह पवित्र हो जाए। मेरा नाम भी स्मरण करने से उसके सारे पाप नष्ट हो जाएं। वह सीधे बैकुंठ (स्वर्ग) को प्राप्त करे। गयासुर का वरदान सुनते ही भगवान विष्णु ने तथास्तु कह दिया। उस समय से गयासुर का शरीर पूरे ब्रह्मांड में सबसे पवित्र हो गया। गयासुर को वरदान मिलते ही एक नई स्थिति पैदा हो गई। बड़े से बड़ा पापी, दुराचारी और अपराधी गयासुर का दर्शन कर स्वर्ग जाने लगा। उसे छूने मात्र से लोग मुक्त होने लगे। इस प्रक्रिया के कारण यमपुरी यानी नरक पूरी तरह खाली होने लगा। धरती से सारे लोग स्वर्ग जाने लगे, धर्म और अधर्म का अंतर मिटने लगा। सभी को अपने पाप से मुक्ति मिलने लगी। इससे सृष्टि का चक्र बिगड़ने लगा। ऐसा होता देख यमराज, इंद्र और अन्य देवता ब्रह्मा जी के पास गए। सभी देवताओं की बात सुनकर समाधान के लिए ब्रह्मा जी भगवान विष्णु के पास गए। समस्या बताने के बाद भगवान विष्णु ने एक लीला रची जिससे गयासुर के इस वरदान का तोड़ निकाला जा सके। भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी को योजना बताई। इसके बाद ब्रह्मा जी सभी देवताओं के साथ गयासुर के पास गए। उन्होंने कहाए हे असुरराज गयासुर, मुझे सृष्टि के कल्याण के लिए एक महान यज्ञ करना है, इसके लिए मुझे पृथ्वी पर कोई ऐसा स्थान नहीं मिलाए जो शुद्ध और पवित्र हो। तुम्हारे शरीर से पवित्र इस धरती पर कुछ नहीं है इसलिए क्या तुम अपना शरीर यज्ञ के लिए दान दोगे। गयासुर दयालु और धार्मिक प्रवृत्ति का था, उसने बिना कुछ सोचे.समझे सृष्टि के कल्याण के लिए अपना शरीर दान कर दिया। वह फल्गु नदी के किनारे उत्तर की ओर सिर और दक्षिण की ओर पैर करके पीठ के बल लेट गया। ब्रह्मा जी ने यज्ञवेदी सजाई और ऋषियों के साथ महायज्ञ शुरू कर दिया।
यज्ञ के बीच में गयासुर का शरीर हिलने लगा। यज्ञ बाधित न हो, इसके लिए ब्रह्मा जी ने यमराज से कहा कि यमलोक से एक विशाल पत्थर मंगवाकर गयासुर की छाती और सिर पर रख दिया जाय। इस पत्थर को धर्मशिला पत्थर कहा जाता है। विशाल शिला रखने के बावजूद गयासुर का हिलना बंद नहीं हुआ। इसके बाद भगवान विष्णु खुद प्रकट हुए। उन्होंने दिव्य रूप धारण कर अपने दाएं पैर से शिला को दबा दिया। भगवान विष्णु के पैर पड़ते ही गयासुर शांत हो गया। आज उसी स्थान पर विष्णुपद मंदिर बना है। यहां भगवान विष्णु का 40 सेंटीमीटर लंबा चरण चिह्न है। गयासुर के इस महान त्याग को देखकर सभी देवता काफी प्रसन्न हुए। उन्होंने गयासुर से अंतिम इच्छा पूछा तो गयासुर ने दो वरदान मांगे। पहला वरदान यह था कि जहां यज्ञ हुआ वह क्षेत्र हमेशा के लिए पवित्र हो जाए। आज उसी क्षेत्र को गयाजी या गयाधाम कहा जाता है। दूसरा वरदान यह था कि इस भूमि पर आकर जो अपने पितरों (पूर्वजों) का पिंडदान, श्राद्धकर्म और तर्पण करेगा उसके पितरों को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलेगी। वह मोक्ष को प्राप्त होगा, उसके सारे पाप और कष्ट दूर हो जाएंगे। भगवान विष्णु ने आशीर्वाद में कहा कि यहां पिंडदान करने वालों के 7 कुलों के पितरों का उद्धार होगा। यहां स्वयं विष्णु पितृदेवता के रूप में वास करेंगे। इस तरह गयाजी हमेशा के लिए सनातन धर्म के लिए मोक्ष नगरी बन गया। त्रेतायुग में वनवास के दौरान भगवान राम, मां सीता और लक्ष्मण यहां आए थे। उन्होंने राजा दशरथ की आत्मा की शांति के लिए फल्गु नदी किनारे पिंडदान किया था। द्वापर युग में महाभारत में मारे गए सगे.संबंधियों के लिए युधिष्ठिर यहां आए थे। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की सलाह पर मगध क्षेत्र गयाजी में आकर पिंडदान किया था। यहां पांचों पांडव, माता कुंती और द्रौपदी ने आकर पिंडदान किया था इसलिए गयाजी में पिंडदान की परंपरा आदि काल से ही रही है।
