आइए जानें जितिया या जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा के बारे में
जितिया (जीवित्पुत्रिका) व्रत में मुख्य रूप से भगवान जीमूतवाहन की पूजा की जाती है। इसके अलावा इस पवित्र पर्व पर भगवान सूर्य नारायण, भगवान वासुदेव (विष्णु), भगवान शिव और माता पार्वती की भी विधि-विधान से पूजा.अर्चना की जाती है। जितिया (जीवित्पुत्रिका) व्रत मुख्य रूप से भारत के बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश राज्यों के साथ-साथ नेपाल में भी बहुत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इसके अलावा, इन राज्यों और नेपाल से ताल्लुक रखने वाले लोग देश के अन्य महानगरों और हिस्सों (जैसे दिल्ली, मुंबई आदि) में भी अपनी संस्कृति के अनुसार इस व्रत का पालन करते हैं।
जितिया (जीवित्पुत्रिका) व्रत की पौराणिक कथा राजा जीमूतवाहन और चील.सियारिन की जुड़ी हुई है। एक कथा के अनुसार गंधर्व राज जिमूतवाहन बड़े दयालु और परोपकारी थे। एक बार वे वटवृक्ष के पास एक वृद्ध नागमाता को रोते हुए देखा तो उसका कारण जानना चाहा तो नागमाता ने रोते हुए बताया कि नागवंश और गरुड़जी की शत्रुता के कारण रोज एक नाग गरुड़ का आहार बनता है, और आज उसके पुत्र की बारी है। यह सुनकर जिमूतवाहन ने कहा कि आप चिंता न करें। उन्होंने नागमाता से कहा कि आज वे उसके पुत्र की जगह खुद लाल कपडे में लिपटकर लेट जाएंगे।
नियत समय पर गरुड़जी आए और जीमूतवाहन को पंजे में दबाकर पहाड़ पर ले गए। जब गरुड़जी ने देखा कि नाग की जगह खुद राजा मुस्कुरा रहे हैं, तो वे हैरान रह गए। राजा ने सारी बात बताई। गरुड़जी उनकी दयालुता से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने नागों को न खाने का वरदान दिया।
एक अन्य कथा के अनुसार किसी जंगल में एक चील और सियारिन पक्की सहेलियां थीं। उन्होंने कुछ महिलाओं को जितिया व्रत करते देखा तो उनके मन में भी व्रत करने की इच्छा जागी। चील ने पूरे नियम और निष्ठा से निर्जला व्रत रखा। सियारिन भूख बर्दाश्त नहीं कर पाई और उसने रात में चुपके से भोजन खा लिया जिससे उसका व्रत खंडित हो गया। व्रत के प्रभाव से चील की संतानें दीर्घायु हुईं, जबकि सियारिन की संतानें पैदा होते ही मर जाती थीं। बाद में उसने अपनी इस गलती की माफी मांगी और निष्ठापूर्वक नियमानुसार ब्रत किया तो उसकी संताने मृत्यु से बचने लगी।
तीसरी कथा महाभारत काल से जुड़ी हुई हैं। महा भारत युद्ध के बाद अपने पिता की मृत्यु के बाद अश्व्थामा बहुत ही नाराज था और उसके अन्दर बदले की आग तीव्र थी, जिस कारण उसने पांडवो के शिविर में घुस कर सोते हुए पांच लोगो को पांडव समझकर मार डाला था, लेकिन वे सभी द्रोपदी की पांच संताने थी। उसके इस अपराध के कारण उसे अर्जुन ने बंदी बना लिया और उसकी दिव्य मणि छीन ली, जिसके फलस्वरूप अश्व्थामा ने उत्तरा की अजन्मी संतान को गर्भ में मारने के लिए ब्रह्मास्त्र का उपयोग किया, जिसे निष्फल करना नामुमकिन था।उत्तरा की संतान का जन्म लेना आवश्यक थी जिस कारण भगवान श्री कृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल उत्तरा की अजन्मी संतान को देकर उसको गर्भ में ही पुनः जीवित किया।गर्भ में मरकर जीवित होने के कारण उसका नाम जीवित्पुत्रिका पड़ा और आगे जाकर यही राजा परीक्षित बना।तब ही से इस व्रत को किया जाता हैं।
