अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा भदोही का हस्तनिर्मित कालीन उद्योग
भदोही। उत्तर प्रदेश के कालीन परिक्षेत्र मीरजापुर-भदोही का हस्तनिर्मित कालीन उद्योग इन दिनों अस्तित्व और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है। हालांकि हार्मुज स्ट्रेट के समुद्री मार्ग में उत्पन्न गतिरोध समाप्त होने से उद्योग जगत ने कुछ राहत की सांस ली है।
मीरजापुर-भदोही के हस्तनिर्मित कालीनों की पहचान केवल एक निर्यात उत्पाद के रूप में ही नहीं, बल्कि देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के रूप में भी की जाती है। लंबे समय से अमेरिका भारतीय हस्तनिर्मित कालीनों का सबसे बड़ा बाजार रहा है। उद्योग से जुड़े सूत्रों के अनुसार इस श्रेणी के कालीनों के कुल निर्यात का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा अकेले अमेरिका को जाता रहा है। ऐसे में वहां आयात शुल्क में वृद्धि अथवा व्यापारिक प्रतिबंधों का सीधा प्रभाव भदोही के निर्यातकों और कारीगरों पर पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारतीय उत्पादों पर लगाए गए अतिरिक्त टैरिफ का असर भारतीय हस्तनिर्मित कालीनों के निर्यात पर भी पड़ा है। उनका कहना है कि हस्तनिर्मित कालीन उद्योग 75 से 80 प्रतिशत तक श्रम आधारित है, इसलिए निर्यातक चाहकर भी उत्पाद की लागत में उल्लेखनीय कमी नहीं कर सकते।
उद्योग जगत के जानकारों के अनुसार भारतीय हस्तनिर्मित कालीनों को वैश्विक बाजार, विशेषकर अमेरिका में चीन के अपेक्षाकृत सस्ते मशीननिर्मित कारपेट से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। इससे भारतीय उत्पादों की बाजार हिस्सेदारी पर दबाव बढ़ा है।
इस बीच भदोही.मीरजापुर की पहचान बने हस्तनिर्मित कालीन उद्योग के सामने कुशल बुनकरों की कमी भी गंभीर चुनौती बनती जा रही है। पारंपरिक पारिवारिक कौशल पर आधारित इस कला में कम आय और रोजगार की अनिश्चितता के कारण नई पीढ़ी का रुझान घट रहा है। शिक्षा और अन्य रोजगार अवसरों के विस्तार से प्रशिक्षित बुनकरों का शहरी क्षेत्रों की ओर तेजी से पलायन भी हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह प्रवृत्ति जारी रही तो उच्च गुणवत्ता वाले हस्तनिर्मित कालीनों के उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है और इस पारंपरिक उद्योग के समक्ष अस्तित्व का संकट और गहरा सकता है।
कालीन निर्यात संवर्धन परिषद (सीईपीसी) के उपाध्यक्ष असलम महबूब ने बताया कि अमेरिकी बाजार में टैरिफ संबंधी अनिश्चितताओं के बीच हार्मुज स्ट्रेट मार्ग में उत्पन्न बाधा उद्योग के लिए एक बड़ी चिंता बन गई थी क्योंकि भारतीय कालीनों का अधिकांश निर्यात इसी समुद्री मार्ग से होता है। उन्होंने कहा कि ईरान और अमेरिका के बीच हाल में बनी सहमति के बाद हार्मुज स्ट्रेट मार्ग के सुचारु रूप से संचालित होने की संभावना बढ़ी है जिससे कालीन निर्यातकों को राहत मिलने तथा अंतरराष्ट्रीय शिपमेंट व्यवस्था सामान्य होने की उम्मीद है।
