लोकप्रिय पर्व सामा चकेवा

छठ पर्व के बाद यह मधुर गीत “सामा खेले गेलीअई हो भईया कोन भईया केर टोल, सामा हेराई गेल हो भईया चकेवा ल गेल चोर” जब कानों में सुनाई देने लगे तो आप समझ जाएं कि मिथिला की पावन भूमि पर आपका पदार्पण हो चुका है। भाई बहन के प्रति अटूट प्रेम और श्रद्वा से जुडा् यह गीत तभी गाया जाता है जब “सामा चकेवा” का पर्व आ जाता है। बहुत ही उत्साह के बहनें इस पर्व को मनाती हैं।
यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि से नौ दिनों तक चलता है। पर्व “सामा.चकेवा” मिथिलांचल की संस्कृति से जुड़ा हुआ है। इस पर्व में भाई-बहन के स्नेह की पवित्रता देखने को मिलती है। इस त्योहार में सामा, चकेवा, चुगला, सतभैया और वृंदावन जैसी मिट्टी की मूर्तियां बनाई जाती हैं और इसे बांस से बनी टोकरी में रखकर शाम में बहनें अपने भाइयों की दीर्घायु, सुख और समृद्धि की कामना को लेकर समूहों में खेलने निकलती हैं। वे पारंपरिक गीत गाती हैं, काजल बनाने और टोकरियां बदलने जैसी रस्में निभाती हैं। बिहार में यह पर्व सहरसा, दरभंगा, मधुबनी और सुपौल जैसे क्षेत्रों में विशेष उत्साह से मनाया जाता है। हिमालय की तलहटी से लेकर गंगा के तटों तक, चंपारण से लेकर दीनाजपुर तक पूरे उत्तर बिहार और नेपाल तराई के क्षेत्रों में भी यह पर्व बड़े उत्साह से मनाया जाता है।
मिथिला की परंपराओं में “सामा चकेवा” घर-घर की पहचान है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन इस पर्व का समापन होता है। समापन के समय भाइयों द्वारा “सामा.चकेवा” की मूर्तियों को घुटने से तोड़ा जाता है और फिर उन्हें खेतों, नदियों या तालाबों में विसर्जित किया जाता है। पंचकोसी मिथिला में इन्हें जुते हुए खेतों में विसर्जित करने की परंपरा है।
” सामा.चकेवा” की कथा का संबंध भगवान कृष्ण की पुत्री श्यामा (सामा) और पुत्र शाम्भ से माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण और जाम्बवती की पुत्री सामा पर एक व्यक्ति (चूड़ा या चुगला) ने गलत आरोप लगाया कि वह वृंदावन के साधुओं से मिलती है। क्रोध में आकर श्रीकृष्ण ने “सामा” को पक्षी बनने का श्राप दिया। श्राप के बाद “सामा” पक्षी बनकर उड़ने लगी, और उसके पति चक्रवा भी उसका साथ देने के लिए स्वेच्छा से पक्षी बन गए। इस घटना में ऋषियों को भी श्राप के कारण पक्षी का रूप मिल गया। “सामा” का भाई शाम्भ जो इस घटना से अनजान था, जब लौटा और उसे अपनी बहन के पक्षी बनने का पता चला तो वह बहुत दुखी हुआ। उसने भगवान श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की ताकि श्राप से मुक्ति मिल सके। “शाम्भ” की तपस्या से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने “सामा” और “चकेवा” को श्राप से मुक्त कर दिया और उनका मानव रूप वापस लौटा दिया। इसी घटना के बाद से “सामा.चकेवा” का त्योहार मनाया जाने लगा।

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