आइए जानते हैं प्रयाग के बारे में
प्रयाग सतयुग काल से अपना धार्मिक तथा सांस्कृतिक महत्व बनाए हुए अपनी विशिष्ट पहचान को बनाए रखा है। गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम स्थल पर स्थित प्रयाग का उल्लेख वेदों, पुराणों, रामायण, महाभारत एवं संस्कृत साहित्य के ग्रंथों में प्रचूर रूप से उपलब्ध है। प्रयाग धर्म संस्कृति का केंद्र रहा है। प्रयाग वैदिक ऋषियों की साधना स्थली और यज्ञों की पावन भूमि रही है। भारतवर्ष के प्रमुख तीर्थो मे श्रेष्ठतम तीर्थ प्रयाग को माना गया है। अन्य धर्म शास्त्रों में प्रयाग की महिमा का गुणगान विशेष रूप से सुलभ है। पुराणों में एक रूपक के माध्यम से बताया गया है कि प्रयाग ही समस्त तीर्थों का अधिपति है। यह भारत का अति प्राचीन तीर्थ है।
मनुस्मृति के अनुसार हिमालय और बिंध्याचल के बीच उस स्थान से पूर्व जहां सरस्वती नदी बालू में छिप जाती है वह प्रयाग है। उस प्रयाग के पश्चिम में जो देश है उसे मध्य देश कहते हैं। सरस्वती नदी के उद्भव और गंगा यमुना के संगम होने के कारण यहां त्रिवेणी संगम कहलाता है जो अपने आप में एक अनूठा स्थल है। गंगा विश्व की सबसे पवित्र नदी है। हिंदू तीर्थ मान्यताओं के अनुसार प्रयाग सभी तीर्थों की आत्मा है। संसार की रचना के बाद ब्रह्मा जी द्वारा यज्ञ करने के कारण इसका नाम प्रयाग पडा।
कुर्म पुराण के अध्याय 39 में लिखा है कि प्रयाग प्रजापति का क्षेत्र है। इसी प्रकार मतस्य पुराण के अध्याय 108 तथा अग्नि पुराण के अध्याय 111 में इस स्थान को प्रजापति की वेदी बतलायी गयी है। बामन पुराण के अध्याय 22 में उल्लेख है कि ब्रह्मा के यज्ञ की पांच वेदियां हैं जिनमें मध्य वेदी प्रयाग है।
