जनता की चुप्पी कुछ नया गुल खिलाएगी

नई दिल्ली। यह बात सही है कि महज चुनावी मौैेसम मेेे ही जनता रूपी फूलो की औकात आंकी जाती है बाकी के दिनो में इन्हे उपेक्षा के तीर चुभोए जाते हैं। सत्ता की कुर्सी पर बैठने के बाद वो इतने मदांध हो जाते हैं कि उन्हे इस बात की भी याद नहीं रहती कि चुनाव के मौसम मे किसके पैर छुकर विजयी होने का आर्शिवाद लिया था। दिल्ली में अभी एमसीडी चुनाव को लेकर गहमा-गहमी चल रही है। सभी प्रत्याशी अपनी-अपनी जीत का दावा ठोक रहे हैं पर यहां इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि चुनावी हवा रातो-रात बदल जाती है।
कई ऐसे प्रत्याशी हैं जिन्हें इस बात का भरोसा है कि वे सिर्फ पार्टी से मिले चुनाव चिन्ह पर विजय पताका लहरा देंगे तो कई ऐसे प्रत्याशी हैं जो चुनाव प्रचार पर काफी जोर दे रहे हैं। जिन प्रत्शीयों को यह आशा है कि वे पार्टी से मिले सिम्बल पर जीत जाएंगे उनका आलम यह है कि वे क्षेत्र  भ्रमण तो कर रहे हैं पर पर्सनली डोर टू डोर जाकर संपर्क नहीं साध रहे है। वहीं कई ऐसे प्रत्याशी हैं जो क्षेत्रों में भ्रमण करने के बाद भी व्यक्तिगत रूप से लोगों से मिलकर अपने पक्ष में मतदान करने की अपील कर रहे हैं। कुछ एसे प्रत्याशी भी नजर आए जो सिर्फ रोड शो के माध्यम से अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया है। ऐसे में यह देखना आवश्यक हो जाता है कि कौन किसके साथ खडा है। यह बात सभी प्रत्याशियों को मालूम है कि दो दिसंबर से ही चुनाव प्रचार बंद हो जाएगा क्योकि आचार संहिता लागू हो जाएगी। इन सबों के बावजूद अगर किसी प्रत्याशी की हार होती है तो इसके लिए किसी दूसरे पर ठीकरा फोडना उचित नहीं मालूम होता है क्योंकि चुनाव में पार्टी हारती है, प्रत्याशी  हारते हैं कार्यकर्ता नहीं।
आपने कई चुनाव देखे होगे ग्राम पंचायत से लेकर विधानसभा और संसदीय चुनाव तक। पर जो पंचायत चुनाव में आपने प्रत्याशियों का अपनापन देखा होगा वो आज विधान सभा चुनाव और संसदीय चुनाव मे देखने को नही मिल रहा। इन सबों के बावजूद आज भी कई ऐसे विधायक और सांसद हैं जिनकी लोकप्रियता उनके क्षेत्रों में केवल इसलिए है कि वे अपने क्षेत्र की जनता को करीब से जानते हैं और उनके लिए वे सदैव तत्पर रहते हैं। पौराणिक इतिहास इस बात का साक्षी है कि जलकर राख वहीं होता है जो किसी के अपनत्व और भरोसे का खूनी होता है। इसका हश्र कई र्पािर्टयों के प्रत्याशियों ने देखा है। जनता रूपी फूलो की पंखुडिया कभी वेजान नहीं होती। जब वह चिंगारियां उगलती है तो बडा से बडा राजमुकूट ध्वस्त हो जाता है। बहरहाल जो भी हो पर दिल्ली की इस एमसीडी चुनाव मे जनता किसे सत्ता की कुर्सी पर आसीन करेगी यह तो भविष्य के गर्त में है पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि जनता की चुप्पी कुछ नया गुल खिलाएगी।

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