कांवड़ को कंधे पर उठाने की क्या है मान्यता 

सावन का महीना भगवान शिव को समर्पित एक पवित्र महीना है। यह महीना हिन्दू कैलेंडर का पांचवा महीना होता है और इसे श्रावण मास भी कहा जाता है। सावन के महीने में भगवान शिव की विशेष पूजा.अर्चना की जाती है। व्रत रखे जाते हैं और रुद्राभिषेक किया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार सावन के महीने में ही समुद्र मंथन हुआ था और भगवान शिव ने हलाहल विष का पान किया था इसलिए इस महीने में शिवजी को जल चढ़ाने की परंपरा है। सावन का महीना चातुर्मास का एक भाग है जो 4 महीनों की अवधि होती है जिसमें भगवान विष्णु शयन करते हैं और भगवान शिव सृष्टि का संचालन करते हैं।
सावन का महीना आते ही उत्तर भारत में शिवभक्ति का उत्सव शुरू हो जाता है। मंदिरों की घंटियां, हर-हर महादेव की गूंज और भक्तों की श्रद्धा से पूरा वातावरण शिवमय हो जाता है। सावन की इस भक्ति में सबसे विशेष परंपरा होती है कांवड़ यात्रा की जिसमें लाखों शिवभक्त ; (जिन्हें कांवड़िया0 कहा जाता है  गंगाजल लेकर लंबी पदयात्रा पर निकलते हैं। यह यात्रा केवल एक धार्मिक रिवाज नहीं, बल्कि यह श्रद्धा, साधना, सेवा और समर्पण का जीवंत प्रतीक है।
कांवड़ यात्रा के दौरान भक्त हरिद्वार,  गंगोत्री,  गौमुख आदि पवित्र स्थलों से गंगाजल भरकर अपने क्षेत्रीय शिव मंदिरों तक पैदल पहुंचते हैं और शिवलिंग पर जल अर्पित करते हैं उनके कंधों पर कांवड़ होती है। कांवड़ एक लकड़ी या बांस की छड़ी जिसके दोनों सिरों पर जल से भरे कलश लटकते होते हैं नियम यह है कि यह कांवड़ यात्रा के दौरान जमीन पर नहीं रखी जाती।
पौराणिक मान्यता है कि भगवान राम ने अपने पिता राजा दशरथ की आत्मा की शांति के लिए गंगाजल कांवड़ में भरकर भगवान शिव को अर्पित किया था। उसी परंपरा का अनुसरण करते हुए आज भी लाखों शिवभक्त कांवर कंधे पर रखकर यात्रा करते हैं। विदित हो कि श्रवण कुमार ने अपने अंधे माता-पिता को कांवर में बैठाकर तीर्थयात्रा करवाई थी। यह सेवा और भक्ति का आदर्श उदाहरण है जो आज भी कांवर यात्रा की भावना को प्रेरित करता है। नंगे पांव सैकड़ों किलोमीटर चलना, कांवर का भार उठाना यह केवल यात्रा नहीं, बल्कि कठोर साधना का रूप है। यह साधना शरीर को नहीं,  मन को शुद्ध करती है। कांवर को कंधे पर उठाना भक्त के भीतर के अहंकार को नष्ट करने और भगवान शिव के समर्पण का प्रतीक माना जाता है। गंगाजल से शिवलिंग अभिषेक करने से पापों का नाश तभी होता है जब यह यात्रा सच्ची आस्था और आत्मपरिवर्तन की भावना से की जाए। कांवड़ यात्रा हर बाधा, कठिनाई और थकान के बावजूद यह दर्शाती है कि भक्त का विश्वास अडिग है। उसका लक्ष्य केवल शिव की कृपा प्राप्त करना है।

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