आइए जानते हैं “महालया” के बारे में
बिरेन्द्र कृष्ण की गायी "जागो तुमि जागो" आज भी है लोकप्रिय
आपने यह कर्णप्रिय मां दुर्गा की स्तुति “जागो तुमि जागो” अवश्य सुना होगा। बिरेन्द्र कृष्ण भद्र की आवाज में प्रसारित होने वाली मां दुर्गा की यह स्तुति आज भी बंगाली परिवार के हर सदस्यों के दिलों पर राज करती है। इस प्रस्तुति में मां दुर्गा को आह्वान कर कहा गया है कि “हे माता अब जागो”। मां दुर्गा की यह स्तुति तब की जाती है जब “महालया” होता है। बंगाल और पूर्वी भारत में इस दिन महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र का पाठ और रेडियो पर प्रसारित होने वाली प्रसिद्ध “महालया” की प्रस्तुति का विशेष महत्व है। पहली बार रिकॉर्ड किए जाने के आठ दशक बाद भी बिरेन्द्र कृष्ण भद्र की मधुर आवाज़ के साथ इसकी कोई तुलना नहीं है। 90 मिनट की प्रसिद्ध संगीत रचना “महिषासुर मर्दिनी” पहली बार 1931 में पंकज कुमार मलिक के निर्देशन में रची गई थी। बानी कुमार द्वारा लिखित यह रचना राक्षस राजा महिषासुर के वध के लिए देवी दुर्गा की रचना पर आधारित है। यह कथा, भजनों और बंगाली भक्ति गीतों का मिश्रण है। इसे 1966 में ही रिकॉर्ड किया गया था जिसके बाद इसका रिकॉर्डेड संस्करण हर जगह बजाया जाने लगा। आकाशवाणी कोलकाता ने कई बार अलग-अलग आवाज़ों के साथ इसकी प्रस्तुति का प्रयास किया लेकिन कोई भी भद्र जैसा जादू नहीं बिखेर पाया। इस दिग्गज ने हमें अपनी बेजोड़ दिल को छू लेने वाली आवाज़ की विरासत छोड़ी है जो “महालया” के दिन बंगाली घरों में पूजा की शुरुआत का प्रतीक बनी हुई है।
हिंदू पंचांग के अनुसार इस साल पितृ पक्ष का आखिरी दिन रविवार 21 सितंबर को है इसलिए “महालया” भी 21 सितंबर को ही मनाया जाएगा। हिन्दू धर्म में “महालया” को दुर्गा पूजा त्योहार की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है इसलिए यह बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। आइए जानते हैं “महालया” क्या है। हिन्दू धर्म में यह क्यों महत्वपूर्ण है और नवरात्रि से इसका क्या संबंध है। हिन्दू धर्म में आश्विन महीने की अंतिम तिथि यानी अमावस्या 16 दिन से चले आ रहे पितृपक्ष का अंतिम दिन होता है। इस दिन को सर्वपितृ अमावस्या भी कहते हैं। देवी दुर्गा और शक्ति की आराधना करने वाले लोगों के लिए यह तिथि बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि भक्तों के आह्वान से देवी दुर्गा का धरती पर आगमन होता है। मान्यता है कि भक्तों के पुकार पर वे इस दिन कैलाश पर्वत से यात्रा कर पृथ्वीवासियों के बीच रहने के लिए आती हैं। देवी दुर्गा के आह्वान और उनके धरती पर आगमन को “महालया” कहा जाता है। बंगाल में इस दिन को लोग खास तरीके से मनाते हैं। इसके साथ ही जिन राज्यों में दुर्गा पूजा धूमधाम से मनाया जाता है उन राज्यों में भी “महालया” का विशेष महत्व है। लोग “महालया” का साल भर प्रतीक्षा करते हैं।
हिंदू धर्म में “महालया” का अपना एक अलग महत्व होता है। “महालया” का एक और महत्वपूर्ण पहलू है मां. दुर्गा की पूजा। इस दिन को मां दुर्गा के धरती पर अवतरण का दिन माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, मां दुर्गा ने”महालया” के दिन धरती पर अवतरण कर महिषासुर नामक राक्षस का वध किया था। इस युद्ध की कहानी “दुर्गा सप्तशती” में वर्णित है। ऐसा माना जाता है कि मां दुर्गा को इस दिन विशेष पूजा और भक्ति से प्रसन्न करने से भक्तों को सुख, समृद्धि और शक्ति प्राप्त होती है। महालया के अगले दिन से घट स्थापना के साथ नवरात्रि और दुर्गा पूजा की शुरुआत हो जाती है। दुर्गा पूजा के त्योहार की शुरुआत का प्रतीक होने के कारण “महालया” अपने आप में हिंदू धर्म में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण त्योहार है। इस साल “महालया” रविवार 21 सितंबर को पड़ रही है। “महालया” के दिन देवी दुर्गा के आगमन से पहले उनकी मूर्तियों को अंतिम रूप दिया जाता है खासकर उनकी आंखों को चित्रित किया जाता है जिसे “चोक्खु दान” या “आंखें चढ़ाना” कहते हैं। यह क्रिया मूर्ति को अंतिम रूप देने और उसे दिव्य जीवन प्रदान करने का प्रतीक है।
