“सौराठ सभा” अब भी मिथिलांचल का धरोहर

मधुबनी। मिथिला पंचांग के अनुसार 2 जुलाई से बिहार के मधुबनी जिले में मैथिल ब्राह्मणों का विश्व प्रसिद्ध वैवाहिक मेला “सौराठ सभा” का सभावास शुरु हो गया। यह सभा 12 जुलाई तक चलेगी। जिले के रहिका प्रखंड के सौराठ सभा परिसर में हर साल आषाढ़ में होने वाले इस “सौराठ सभावास” में मैथिल ब्राह्मण के वर तथा कन्या पक्ष के लोग पहुंचते हैं। यहां मूल, गोत्र के आधार पर आपसी सहमति से वैवाहिक संबंध तय होते हैं। यह विशाल मेला आम तौर पर हिंदू कैलेंडर के ज्येष्ठ.आषाढ़ (मुख्य रूप) से (जून) महीने में 22 एकड़ (22 बीघे) के आम के बगीचे में आयोजित होता है, जिसे दरभंगा के महाराजा द्वारा दान किया गया था।
प्राचीन काल में गुरुकुल से सीधे योग्य छात्रों ध्विद्वानों को इस सभा में लाया जाता था। वहां उनकी विद्वत्ता की परीक्षा और शास्त्रार्थ होता था, जिसके बाद योग्य वर को कन्यादान के लिए चुना जाता था किंतु अब विद्वत्ता की परीक्षा और शास्त्रार्थ को बदलते समय के साथ ग्रहण लग गया। इस सभावास में वर्तमान में मधुबनी, दरभंगा, सीतामढ़ी, समस्तीपुर, बेगूसराय, बेतिया, पूर्णिमा, कटिहार, मुजफ्फरपुर सहित बिहार के अन्य जिलों के अलावा नेपाल से भी ब्राह्मण समाज के लोग पहुंचते हैं। धोती,कुर्ता और सिर पर पाग में वर व कन्या पक्ष के लोग पहुंचने वालों में मिथिला की संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। आंख में काजल, माथे पर कोकटी पाग, हाथ में छाता और बेंत, जमीन पर दरी, कंबल पर सुयोग्य वर को यहां आसानी से देखा जा सकता है।  वहीं मोटिया धोती और कुर्ता, माथे पर चंदन, सिर पर पाग और चेहरे पर शिकन लिए बुज़ुर्गों को भी देखा जा सकता है जो यहां अपनी कन्या के बास्ते सुयोग्य वर की तलाश में आते हैं।
उल्लेखनीय है कि मैथिल ब्राह्मणों का सदियों पुराना वैवाहिक निर्धारण स्थल “सौराठ सभा” की परंपरा 14वीं शताब्दी से चली आ रही है। यहां वंशावली विशेषज्ञ पंजिकार के माध्यम से वर, कन्या दोनों पक्षों के सात पीढ़ियों तक के रक्त संबंधों की जांच की जाती है जिससे समगोत्र में वैवाहिक संबंध से बचा जा सके। मिथिला के कर्णाट वंश के राजा हरिसिंह देव ने “सौराठ सभा” की शुरुआत कराई थी। तब पंजी प्रथा का प्रचलन नहीं था। लोग छिटपुट वंश परिचय रखते थे। बाद में मिथिलाक्षर में पंजी प्रबंधन शुरू हुआ। पंजीकार वंश परिचय का अभिलेख रखने लगे। यह परंपरा आज भी जारी है।
70 से लेकर 90 के दशक के बीच बिहार के तत्कालीन सीएम जगन्नाथ मिश्र, अब्दुल गफूर, भागवत झा आजाद इस सभा में शामिल होते थे। मिथिलांचल के सांसद और विधायक भी यहां आते थे। पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी “सौराठ सभागाछी” के लिए कई घोषणाएं कर चुके हैं, मगर ग्राउंड लेवल की बात की जाए तो यहां बहुत बदलाव देखने को नहीं मिला।
इस सभा की चर्चा करते हुए  एक पंजीकार  ने कहा कि सौराठ सभा में आधा दर्जन पंजीकार हैं। पंजीकार पंजी लेखन करते हैं। एक पंजीकार के पास सात से आठ सौ गांवों की जिम्मेदारी होती है। एक पंजी में 500 से अधिक लोगों की सात से अधिक पीढिय़ों की वंशावली का विवरण रहता है। “सौराठ सभा” का आज तक कोई आयोजक नहीं हुआ। बिना आयोजक और बिना प्रायोजक लगभग 700 वर्षों से बिना रूके ये सभा चल रही हैं। “सौराठ सभा” अब भी मिथिलांचल का धरोहर बना हुआ है। हालांकि अब इसमें ज्यादा दूल्हे तो देखने को नहीं मिलते हैं लेकिन मिथिलांचल के कई उत्साही युवा संगठन अपने पूर्वजों की इय विरासत को सहेजने की कोशिश मे आज भी लगे है।

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