नहीं रहे बिहार के दिग्गज कांग्रेसी सदानंद सिंह
पटना। बिहार कांग्रेस के दिग्गज नेता सदानंद सिंह का निधन हो गया। उनके निधन के साथ ही बिहार में कांग्रेस ने आज अपना सबसे मजबूत सिपाही खो दिया। कांग्रेस में तमाम उतार-चढाव के गवाह रहे सदानंद सिंह ने बिहार की राजनीति में एक अलग पहचान बनायी थी और सबसे अधिक बार विधायक बनने का रिकॉर्ड भी इन्हीं के नाम हैं।
बताया जाता है कि 1967 ई. में सदानंद सिंह ने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर महज 25 साल की उम्र में 1969 ई. में पहली बार बिहार विधान सभा के सदस्य बने। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। अपनी लोकप्रियता और राजनीतिक सूझबूझ के बूते उन्होंने 1972, 1977 और 1980 ई. में लगातार जीत हासिल की। 1985 में इन्हें कांग्रेस से टिकट काट दिया गया तब ये निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनावी अखाड़े में उतरे और चुनाव जीतकर यह सावित कर दिया कि वे जन-जन के नेता हैं। सदानंद की इस जीत से कांग्रेस आलाकमान की नजर में उनका कद और ऊंचा हो गया।
कहलगांव में सदानंद सिंह को कांग्रेस का पर्याय माना जाने लगा। कहा जाने लगा कि यहां सदानंदी वोटर काम करता है। इसी बीच जनता दल से लालू प्रसाद की लोकप्रियता बढ़ी तो 1990 व 1995 के चुनाव में वे सदन से बाहर रहे, लेकिन सत्ता के गलियारे में उनका कद इतना ऊंचा था कि वे हार कर भी विजेता की भांति जनता के बीच सक्रिय रहे और 2000 ई. के चुनाव में फिर से जीत हासिल की। इस बार उन्हें बिहार विधान सभा का अध्यक्ष बनाया गया।
2005 के आम चुनाव में पुन: उन्होंने जीत दर्ज की, लेकिन त्रिकोणीय संघर्ष के कारण कोई भी दल की सरकार नहीं बना पायी लिहाजा 2005 में ही फिर से चुनाव हुआ और इस बार वे जदयू के अजय मंडल से चुनाव हार गए और फिर 2010 ई. में विधान सभा सदस्य बने। अंतिम बार 2015 में चुनाव जीते और 2020 ई. में राजनीति से संन्यास ले लिया औ र राजनीति की विरासत अपने पुत्र शुभानंद को सौंप दिया। सदानंद सिंह की लोकप्रियता कभी खत्म नहीं हुई। उनके निधन की खबर सुनते ही कांग्रेस के लोग शोक संतप्त हो गए हैं।
