बस कंडक्टरी ने खोले फिल्मी दुनिया के दरवाजे
मुंबई। बॉलीवुड में अपने जबरदस्त कॉमिक अभिनय से दर्शकों के दिलो में गुदगुदी पैदा करने वाले हंसी के बादशाह जॉनी वाकर को बतौर अभिनेता अपने सपनों को साकार करने के लिए बस कंडक्टर की नौकरी भी करनी पड़ी थी।
मध्य प्रदेश के इंदौर में एक मध्यमवर्गीय मुस्लिम परिवार में जन्मे बदरुद्दीन जमालुद्दीन काजी, जिन्हें दुनिया जॉनी वाकर के नाम से जानती है बचपन से ही अभिनेता बनने का सपना देखते थे। वर्ष 1942 में उनका परिवार मुंबई आ गया। परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए उन्होंने बस कंडक्टर की नौकरी शुरू की। नौकरी के दौरान उनका अनोखा अंदाज यात्रियों को खूब पसंद आता था और इसी ने आगे चलकर उनके लिए फिल्मी दुनिया के दरवाजे खोले। बस कंडक्टरी के दौरान उनकी मुलाकात अभिनेता बलराज साहनी से हुई जिन्होंने उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए उन्हें फिल्मकार गुरु दत्त से मिलने की सलाह दी। गुरु दत्त उनकी हास्य प्रतिभा से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपनी फिल्म बाजी (1951) में उन्हें काम करने का अवसर दिया। इस फिल्म की सफलता के बाद जॉनी वाकर ने बतौर हास्य अभिनेता अपनी अलग पहचान बना ली।
बाजी के बाद वह गुरु दत्त के पसंदीदा कलाकारों में शामिल हो गए और “आर-पार”, “मिस्टर एंड मिसेज 55”, “प्यासा”, “कागज के फूल” तथा “चौदहवीं का चांद” जैसी फिल्मों में अपने अभिनय का जादू बिखेरा। इसके अलावा “टैक्सी ड्राइवर”, “देवदास”, “चोरी.चोरी”,” मधुमती” “मुगल-ए-आजम”, “मेरे महबूब” और “बहू बेगम” जैसी फिल्मों में भी उन्होंने दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। जॉनी वाकर की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण उन पर फिल्माए गए गीत भी थे। फिल्म “सीआईडी” का गीत “ऐ दिल है मुश्किल जीना यहां, जरा हटके, जरा बचके, ये है बंबई मेरी जान” आज भी याद किया जाता है। “प्यासा” का “सर जो तेरा चकराए”, “मिस्टर एंड मिसेज 55” का “जाने कहां मेरा जिगर गया जी” और “चौदहवीं का चांद” का “मेरा यार बना है दुल्हा” जैसे गीत उनकी लोकप्रियता को नई ऊंचाइयों तक ले गए।
वर्ष 1958 में प्रदर्शित फिल्म “मधुमती” में उत्कृष्ट अभिनय के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। इसके बाद वर्ष 1968 की फिल्म “शिकार” के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता के फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सत्तर के दशक में उन्होंने फिल्मों में काम करना काफी कम कर दिया क्योंकि उनका मानना था कि फिल्मों में हास्य का स्तर बदल रहा है। हालांकि, “आनंद” में उनकी छोटी लेकिन प्रभावशाली भूमिका आज भी याद की जाती है। वर्ष 1998 में प्रदर्शित “चाची 420” में भी उनका संक्षिप्त अभिनय दर्शकों को खूब पसंद आया। करीब पांच दशक लंबे सिने करियर में लगभग 300 फिल्मों में अभिनय करने वाले जॉनी वाकर ने अपनी विशिष्ट शैली, संवाद अदायगी और हास्य प्रतिभा से दर्शकों के दिलों में अमिट छाप छोड़ी। भारतीय सिनेमा के इस महान हास्य कलाकार का 29 जुलाई 2003 को निधन हो गया।
