यहां ब्रह्माजी ने किया था दशाश्वमेध यज्ञ
इलाहाबाद के दारागंज क्षेत्र में गंगा तट पर स्थित दशाश्वमेध मंदिर का अपना एक पौराणिक एवं इतिहास रहा है। यूं तो इस मंदिर की स्थापना को लेकर कई तथ्य हैं। पुराणों के अनुसार इसी स्थान पर स्वय ब्रह्माजी ने दशाश्वमेध यज्ञ किया था। यह यज्ञ मानव कल्याण के लिए किया जाता है। इस मंदिर के गर्भगृह में दो शिवलिंग स्थापित हैं। दशाश्वमेध यज्ञ होने के कारण ही इस मंदिर का नाम दशाश्वमेध मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यहां स्थित दोनो शिवलिंग काले पत्थर के हैं। एक दशाश्वमेध महादेव का और दूसरा ब्रह्मेश्वर महादेव का। दोनो शिवलिंगों के बीच एक त्रिशूल स्थापित है। मंदिर में भगवान शिव के वाहन नंदी तथा शेषनाग आदि की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। इस मंदिर के निकट ही चैतन्य महाप्रभु की पीठ भी है। इस क्षेत्र में पंडा लोग का निवास स्थान भी है जो प्राचीन समय से मराठा शासकों तथा घरानों में उनके पुरोहितों का काम करते रहे हैं।
मुगलकाल के शासन में औरंगजेव जो हिंदू संस्कृति का विरोधी था ने यहां काफी उत्पात मचाया। उसने इस दशाश्वमेध मंदिर में स्थापित प्राचीन शिवलिंग पर अपनी तलवार से वार कर दो खंडों में विभाजित कर दिया था। यह उसकी धर्मविरोधी मानसिकता एवं नीति का प्रत्यक्ष प्रमाण है जो आज भी प्रयाग को परिलक्षित है। बाद में भक्तगणों ने उसी प्रकार एक पूर्ण शिवलिंग का उसी स्थल पर निर्माण कराया। दोनो शिवलिंग एक ही स्थान पर आज भी मौजूद है। खंडित शिवलिंग को आज भी देखा जा सकता है और इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि औरंगजेव कितना हिंदू विरोधी था। इस मंदिर में भगवान शिव की आराधना, रूद्राभिषेक का कार्य आज भी किया जाता है। हिंदुओं की आस्था का केंद्र आज भी प्रसिद्ध है इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यहां आज भी पूरे वर्ष में दस से बारह लाख भक्त आते हैं और भगवान शिव का आशिर्वाद प्राप्त करते हैं।
