चौरचन की शुरुआत के पीछे की कहानी

चौरचन की शुरुआत के पीछे की कहानी यह है कि मुगल बादशाह अकबर ने तिरहुत की नेतृत्वहीनता और अराजकता को खत्म करने के लिए 1556 में महेश ठाकुर को मिथिला का राज सौंपा। बडे भाई गोपाल ठाकुर के राज गद्दी त्याग देने के बाद 1568 में हेमांगद ठाकुर मिथिला के राजा बने, लेकिन उन्हें राजकाज में कोई रुचि नहीं थी। उनके राजा बनने के बाद लगान वसूली में अनियमितता को लेकर दिल्ली तक शिकायत पहुंची। राजा हेमांगद ठाकुर को दिल्ली तलब किया गया। दिल्ली का बादशाह यह मानने को तैयार नहीं था कि कोई राजा पूरे दिन पूजा और अध्य‍यन में रमा रहेगा और लगान वसूली के लिए उसे समय ही नहीं मिलेगा। लगान छुपाने के आरोप में हेमानंद को जेल में डाल दिया गया।
मुकुंद झा बख्शी अपनी किताब खंडवला राजवंश में लिखते हैं कि कारावास में हेमांगद पूरे दिन जमीन पर गणना करते रहते थे। प्रहरी पूछता था तो वो चंद्रमा की चाल समझने की बात कहते थे। धीरे-धीरे यह बात फैलने लगी कि हेमांगद ठाकुर की मानसिक स्थिति ठीक नहीं है और इन्हें इलाज की जरुरत है। यह सूचना पाकर बादशाह खुद हेमांगद को देखने कारावास पहुंचे। जमीन पर अंकों और ग्रहों के चित्र देख पूछा कि आप पूरे दिन यह क्या लिखते रहते हैं। हेमांगद ने कहा कि यहां दूसरा कोई काम था नहीं सो ग्रहों की चाल गिन रहा हूं। करीब 500 साल तक लगनेवाले ग्रहणों की गणना पूरी हो चुकी है।
बादशाह ने तत्काल हेमांगद को ताम्रपत्र और कलम उपलब्ध कराने का आदेश दिया और कहा कि अगर आपकी भविष्यवाणी सही निकली तो आपकी सजा माफ़ कर दी जाएगी। हेमांगद ने बादशाह को माह, तारीख और समय बताया। उन्होंने चंद्रग्रहण की भविष्यवाणी की थी। उनके गणना के अनुसार चंद्रग्रहण लगा और बादशाह ने न केवल उनकी सजा माफ़ कर दी बल्कि आगे से उन्हें किसी प्रकार लगान देने से भी मुक्त कर दिया। अकर (टैक्स फ्री) राज लेकर हेमांगद ठाकुर जब मिथिला आये तो रानी हेमलता ने कहा कि मिथिला का चांद आज कलंकमुक्त हो गये हैं, हम उनका दर्शन और पूजन करेंगे। रानी हेमलता के पूजन की बात जन-जन तक पहुंची। लोगों ने भी चंद्र पूजा की इच्छा व्यक्त की। मिथिला के पंडितों से राय विचार के उपरांत राजा हेमांगद ठाकुर ने इसे लोकपर्व का दर्जा दे दिया। इस प्रकार मिथिला के लोगों ने कलंकमुक्ति की कामना को लेकर चतुर्थी चन्द्र की पूजा प्रारम्भ कीै। हर साल इस दिन मिथिला के लोग शाम को अपने सुविधानुसार घर के आँगन या छत पर चिकनी मिट्टी या गाय के गोबर से नीप कर पीठार से अरिपन देते हैं। पूरी, पकवान,  फल,  मिठाई,  दही इत्यादि को अरिपन पर सजाया जाता है और हाथ में उठाकर चंद्रमा का दर्शन कर उन्हें भोग लगाया जाता है।

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