“केरवा जे फरेला घवद से ओहपर सुग्गा”…. ….
दीपावली पर्व के समाप्त होते ही शहर और गांव की गलियों में जब यह कर्णप्रिय गीत "केरवा जे फरेला घवद से ओहपर सुग्गा मंड़राय, मरवउ रे सुगवा धनुख से सुग्गा जइहें मुरझाए" सुनाई देने लगता है तो मानव शरीर उत्साह से भर जाता है और छठ पर्व की याद…
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