भारत की अटूट आस्था का प्रतीक सोमनाथ मंदिर : मोदी

सोमनाथ। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोमवार को यहां पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर के लोकार्पण की 75 वीं वर्षगांठ पर आयोजित सोमनाथ अमृत महोत्सव के मौके पर कहा कि यह अटूट आस्था, दिव्यता और भारत की सनातन आत्मा का पवित्र प्रतीक है जो आने वाले एक हजार वर्षों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। श्री मोदी ने कहा कि 75 वर्ष पहले इसी दिन सोमनाथ मंदिर की पुनर्स्थापना कोई साधारण अवसर नहीं था बल्कि इसने सोमनाथ की प्राण-प्रतिष्ठा ने भारत की स्वतंत्र चेतना की उद्घोषणा की थी।
श्री मोदी ने इस आयोजन को केवल एक औपचारिक समारोह नहीं, बल्कि भारत की सनातन चेतना और सभ्यतागत धैर्य की घोषणा बताया। वर्ष 1951 में सोमनाथ मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के ऐतिहासिक महत्व पर बल देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि यह कोई सामान्य अवसर नहीं था। यदि 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ तो 1951 में सोमनाथ की प्राण-प्रतिष्ठा ने भारत की स्वतंत्र चेतना की घोषणा की। स्वतंत्रता के केवल चार वर्ष बाद मंदिर के पुनर्निर्माण के महत्व पर प्रधानमंत्री ने कहा कि जब राष्ट्र विदेशी बंधनों से मुक्त हुआ, उसी समय सोमनाथ के पुनर्निर्माण ने दुनिया को यह संदेश दिया कि भारत केवल स्वतंत्र नहीं हुआ है बल्कि वह अपने प्राचीन वैभव को पुनः प्राप्त कर रहा है। इस अवसर के बहुआयामी महत्व को स्पष्ट करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि वह केवल 75 वर्षों का इतिहास नहीं देख रहे हैं। मैं यहां विनाश में सृजन के उस संकल्प को देख रहा हूं जिसे सोमनाथ ने पूर्ण किया है। उन्होंने इस पवित्र भूमि में असत्य पर सत्य की सनातन विजय का अनुभव होने की बात कही।
प्रधानमंत्री ने भविष्य का जिक्र करते हुए कहा कि सोमनाथ अमृत महोत्सव केवल अतीत का स्मरण नहीं है। उन्होंने कहा कि यह केवल अतीत का उत्सव नहीं, बल्कि आने वाले एक हजार वर्षों के लिए भारत की प्रेरणा भी है । उन्होंने इस दिन को राष्ट्रीय इतिहास की एक अन्य महत्वपूर्ण घटना से भी जोड़ा और कहा कि 1998 में आज के ही दिन किये गये पोखरण परमाणु परीक्षणों की वर्षगांठ भी है। उन्होंने कहा कि भारत ने 11 मई को तीन परमाणु परीक्षण करके भारतीय वैज्ञानिकों की क्षमता का प्रदर्शन किया था। इसके दो दिन बाद 13 मई को हुए अतिरिक्त परीक्षणों को उन्होंने भारत के अटूट राजनीतिक संकल्प का प्रमाण बताया। उन्होंने कहा कि उस समय पूरे विश्व का दबाव भारत पर था लेकिन अटल जी के नेतृत्व में तत्कालीन सरकार ने दिखा दिया कि हमारे लिए राष्ट्र सर्वोपरि है, दुनिया की कोई शक्ति भारत को झुका नहीं सकती और न ही दबाव में ला सकती है। इस अभियान के नाम के महत्व को स्पष्ट करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि पोखरण परमाणु परीक्षण को ऑपरेशन शक्ति नाम गहरे सांस्कृतिक कारणों से दिया गया था। उन्होंने कहा कि शिव और शक्ति की संयुक्त उपासना का दर्शन अब भारत की वैज्ञानिक प्रगति को भी प्रेरित कर रहा है। उन्होंने कहा कि आज हम इस संकल्प को साकार होते देख रहे हैं कि हमारी शिव और शक्ति की उपासना देश की वैज्ञानिक प्रगति की प्रेरणा भी बने।

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