असम का रंगीन त्योहार रोंगाली बिहु 14 अप्रैल को

यूं तो हर त्योहार का अपना अलग ही मजा है और हर त्योहार के मनाए जाने के पीछे कुछ न कुछ राज जरूर होता है। किंतु जब इन त्योहारों को हरी-भरी वादियों के बीच खुले गगन में रंगीन कपडो से सुसज्जित होकर नाचते गाते मनाया जाता है तो एक मनोरम छटा पैदा करता है जिसे भूलना आसान नहीं होता। इस बार भी 14 अप्रैल 2021 को असम की हरी-भरी पहाडियों के बीच खुले गगन के नीचे रोंगाली बिहू मनाया जाएगा।
रोंगाली बिहु असम में मनाया जाने वाला सबसे बड़ा त्‍योहार है। यह त्‍योहार असम में साल में तीन बार मनाया जाता है। माघ बिहु (मध्य जनवरी), रोगाली बिहु (मध्य अप्रैल)  और काति बिहु (मध्य अक्टूबर) में मनाया जाता है। आज से असम में रोंगाली बिहु प्रारंभ हुआ हैं। बिहु शब्द बिहु नृत्य और बिहू लोक गीत दोनो की और् संकेत करते है। रोंगाली बिहु या बोहाग बिहु असम का एक महत्वपूर्ण त्योहार है।यह त्‍योहार मस्ती के साथ मनाया जाता है बिना उनके जाति, धर्म और विश्वास में भेद किये।

बिहु शब्द दिमासा लोगों की भाषा से लिया गया है जो की प्राचीन काल से एक कृषि समुदाय है। उनकी सर्वोच्च देवता ब्राई शिबराई या पिता शिबराई हैं। मौसम की पहली फसल अपनी शांति और समृद्धि की कामना करते हुए ब्राई शिबराई के नाम पर अर्पित किया जाता हैं। बिहू के पहले दिन गोरू यानि गाय का बिहू होता है। इसमें गाय को नहला धुलाकर बैगन, हल्दी, करैला, लाव आदि से मारा जाता है। इसके पीछे राज ये है कि सालो भर इन सब्जियों का उत्पादन होता रहे और गायों को हरा चारा मिलता रहे। यह कामना की जाती है। इसके अलावा दूसरे दिन से मानवों का बिहू होता है जिसमें लोग अपने से बडे बुजुर्गो को नए वस्त्र धोती, गमछा आदि देकर उनसे आर्शिवाद प्राप्त करते है। धरों में तरह-तरह के पकवान बनाए जाते है और पूरे परिवार को खिलाने के साथ ही एक दूसरे को बांटते हैं। यह एक ऐसा त्योहार है जो आपसी भाईचारे को बढावा देता है। वास्तव में यदि हिंदुस्तान की संस्कृति और त्योहारों का अध्ययन करना हो तो गांवो में मनाए जानेवाले त्योहारों को देखकर ही समझा जा सकता है। कहा भी गया है कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है।
तो बि मतलब पुछ्ना और श मतलब पृथ्वी में शांति और समृद्धि हैं। अत: शब्ब्दै बिशु धीरे-धीरे भाषाई तहजीह को समायोजित करने के लिये बिहु बन गया। अन्य सुझाव यह हैं कि तो बि मतलब पुछ्ना और श मतलब  और हु मतलब देना और वही से बिहु नाम उत्पन्न हुआ। यह  कलागुरु  विष्णु प्रसाद राभा द्वारा कहा गया था। असम में रोंगाली बिहू बहुत सारे परंपराओं से ली जाती हैं जैसे की. बर्मी, चीन, ऑस्ट्रो, एशियाटिक, हिंद.आर्यन.।

त्योहार अप्रैल के मध्य में शुरू होता हैं और आम तौर पर एक महीने के लिए जारी रहता है। यह पारंपरिक नव वर्ष है। असमीज इस खूबसूरत त्‍योहार को रंग बिरंगे कपड़े पहन कर मनाते हैं। वे इस अवसर पर अपने पड़ोसियों, शुभचिंतकों और रिश्तेदारों के यहां मिठाइयां और अन्‍य व्‍यंजन ले कर जाते हैं और उन्‍हें बधाई देते हैं। इस खास अवसर पर वे अपने घरों में विशेष पीठा बनाते हैं जो कि खास इसी दिन बनाया जाता है। इसके अलावा तिल के लड्डू और नारियल के लड्डू भी बनाए जाते हैं। बिहु पर लोग गाय.भैंस आदि को भी पूजते हैं और उन्‍हें घर का भोजन भी खिलाते हैं।यह एक रंगीन त्‍योहार है इसलिये गांव के लड़के और लड़कियां पारंपरिक धोती, गमोछा जिसे असमिज भाषा में गमोसा कहा जाता है और अन्‍य रंगीन कपड़े पहन कर टोली बना कर नृत्‍य करते हैं। बिहु के त्‍योहार में लोग अपने प्रियजनों को फूल और गमछा भी भेंट करते हैं। नव युवक एक महीने पहले से ही ढोल, पेपा, गगना (बिहू के वाद्य यंत्र) आदि कि तैयारी करते हैं और नव युवतियां उनकी ताल और सुर पर थिरकती हुई बिहू नृत्य करती हैं। यह बिहू इतने उल्लास और उत्साह वर्धक होता हैं कि गांव हो या शहर बच्चे हो या बूढ़े सभी आनंद का उपभोग करते हैं। इस त्योहार को मनाने के लिए महिलाएं भी अपने परिधानों को पहले से ही तैयार करने लगती हैं। इस पर्व को लेकर एक खासा उत्साह इनके दिलो में बसते हैं और यही कारण है कि बहुत ही उल्लास के साथ इस पर्व को मनाया जाता है।

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