“केरवा जे फरेला घवद से ओहपर सुग्गा”…. ….

दीपावली पर्व के समाप्त होते ही शहर और गांव की गलियों में जब यह कर्णप्रिय गीत “केरवा जे फरेला घवद से ओहपर सुग्गा मंड़राय, मरवउ रे सुगवा धनुख से सुग्गा जइहें मुरझाए”  सुनाई देने लगता है तो मानव शरीर उत्साह से भर जाता है और छठ पर्व की याद दिलाए बिना नहीं छोडता। शायद यही कारण है कि लोग इस पावन पर्व को मनाने अथवा इसमें शामिल होने के लिए दूर देश से भी किसी न किसी प्रकार अपने घरों को पहुंचना चाहते है। सरकार भी ऐसे मौके पर लोगों के लिए अतिरिक्त रेल सुविधा प्रदान करने में कोई प्रयास नहीं छोडती।
इस महान पर्व की शुरूआत और विशेषता की बात की जाए तो यह कहा जा सकता है कि इसकी शुरूआत बिहार से हुई जो अब विदेशों तक मनायी जाने जगी है। छठ व्रत के सम्बन्ध में अनेक कथाएँ प्रचलित हैं।  उनमें से एक कथा के अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गये, तब श्री कृष्ण द्वारा बताये जाने पर द्रौपदी ने छठ व्रत रखा। तब उनकी मनोकामनाएँ पूरी हुईं तथा पांडवों को उनका राजपाट वापस मिला। लोक परम्परा के अनुसार सूर्यदेव और छठी मइया का सम्बन्ध भाई-बहन का है इसलिए छठ के मौके पर सूर्य की आराधना फलदायी मानी गई है।
-धार्मिक मान्यता के अनुसार माता सीता ने सबसे पहला छठ पूजन बिहार के मुंगेर में गंगा तट पर सपन्न किया था। इसके बाद महापर्व छठ की शुरुआत हुई। छठ को बिहार का महापर्व माना जाता है। यह पर्व बिहार के साथ देश के अन्य राज्यों में भी बड़ी धूम -धाम के साथ मनाया जाता है। बिहार के मुंगेर में छठ पर्व का विशेष महत्व है। छठ पर्व से जुडी कई लोककथाएं है लेकिन धार्मिक मान्यता के अनुसार माता सीता ने सर्वप्रथम छठ पूजन किया था इस बात के प्रमाण स्वरूप आज भी बबुआ घाट के पश्चिमी तट पर माता सीता के चरण चिन्ह मौजूद हैं। माता सीता के चरण चिन्ह एक विशाल पत्थर पर अंकित हैं। पत्थर पर दोनों  चरणों के निशान हैं।
वाल्मीकि और आनंद रामायण के अनुसार ऐतिहासिक नगरी मुंगेर के सीता चरण में कभी मां ने छह दिन तक रहकर छठ पूजा की थी। श्री राम जब 14 वर्ष वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे तो रावण वध से पाप मुक्त होने के लिए ऋषि .मुनियों के आदेश पर राजसूय यज्ञ करने का फैसला लिया। इसके लिए मुग्दल ऋषि को आमंत्रण दिया गया था लेकिन मुग्दल ऋषि ने भगवान राम एवं सीता को अपने ही आश्रम में आने का आदेश दिया। जिसके बाद मुग्दल ऋषि ने माता सीता को सूर्य की उपासना करने की सलाह दी थी। मुग्दल ऋषि के आदेश पर भगवान राम और माता सीता पहली बार मुंगेर आए थे। यहां पर ऋषि के आदेश पर माता सीता ने कार्तिक की षष्ठी तिथि पर भगवान सूर्य देव की उपासना मुंगेर के बबुआ गंगा घाट के पश्चमी तट पर छठ व्रत किया था। जिस जगह पर माता सीता ने व्रत किया वहां पर माता सीता का एक विशाल चरण चिन्ह आज भी मौजूद हैए इसके अलावे शिलापट्ट पर सूप, डाला और लोटे के निशान हैं। मंदिर का गर्भ गृह साल में छह महीने तक गंगा के गर्भ में समाया रहता है। जलस्तर घटने पर छह महीने ऊपर रहता है। इस मंदिर को सीताचरण मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। वही सीता मां के पद चिन्ह का दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते रहते हैं।
इन कथाओं के अलावा एक और किवदंती भी प्रचलित है। पुराणों के अनुसार प्रियव्रत नामक एक राजा को कोई संतान नहीं था। इसके लिए उसने हर जतन कर कर डाले लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। तब उस राजा को संतान प्राप्ति के लिए महर्षि कश्यप ने उसे पुत्रयेष्टि यज्ञ करने का परामर्श दिया। यज्ञ के बाद महारानी ने एक पुत्र को जन्म दिया लेकिन वह मरा पैदा हुआ। राजा के मृत बच्चे की सूचना से पूरे नगर में शोक छा गया। कहा जाता है कि जब राजा मृत बच्चे को दफनाने की तैयारी कर रहे थे तभी आसमान से एक ज्योतिर्मय विमान धरती पर उतरा। इसमें बैठी देवी ने कहा मैं षष्ठी देवी और विश्व के समस्त बालकों की रक्षिका हूं। इतना कहकर देवी ने शिशु के मृत शरीर को स्पर्श किया जिससे वह जीवित हो उठा। इसके बाद से ही राजा ने अपने राज्य में यह त्योहार मनाने की घोषणा कर दी।

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