अनंत चतुर्दशी एवं अनंतसूत्र की महिमा

पं. बिजेंद्र मिश्र

भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी को अनन्त चतुर्दशी कहा जाता है। इस व्रत में भगवान विष्णु की जहां लोग आराधना और पूजन काते हैं वहीं दूसरी ओर प्रथम पूज्य भगवान गणेश की प्रतिमा का विसर्जन करने का विधान है। अनंत यानी जिसके न आदि का पता है और न ही अंत का। अर्थात वे स्वयं श्री हरि यानी भगवान विष्णु हैं। अनंत चतुर्दशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है।
जहां तक हिंदू धर्म में इसके बारे में बात की जाए तो कहा जाता है कि जब पाण्डव धृत क्रीड़ा में अपना सारा राज.पाट हारकर वन में कष्ट भोग रहे थे तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अनन्तचतुर्दशी का व्रत करने की सलाह दी थी। धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने भाइयों तथा द्रौपदीके साथ पूरे विधि-विधान से यह व्रत किया तथा अनन्तसूत्रधारण किया। अनन्तचतुर्दशी.व्रत के प्रभाव से पाण्डव सब संकटों से मुक्त हो गए। इसके अलावा एक कहानी और है कि एक दिन कौण्डिन्य मुनि की दृष्टि अपनी पत्नी शीला के बाएं हाथ में बंधे अनन्तसूत्र पर पडी तो वह भ्रमित हो गए और उन्होंने पूछा शीला क्या यह सूत्र तुमने मुझे अपने वश में करने के लिए बांधा है। शीला ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया.जी नहीं, यह अनंत भगवान का पवित्र सूत्र है। परंतु ऐश्वर्य के मद में अंधे हो चुके कौण्डिन्यने अपनी पत्नी की सही बात को भी गलत समझा और अनन्तसूत्र को जादू-मंतर वाला वशीकरण करने का डोरा समझकर तोड दिया तथा उसे आग में डालकर जला दिया। इस जघन्य कर्म का परिणाम यह हुआ कि कौण्डिन्य मुनि की सारी संपत्ति नष्ट हो गई। दीन-हीन स्थिति में जीवन.यापन करने को वो विवश हो गए। कौण्डिन्य ऋषि ने अपने अपराध का प्रायश्चित करने का निर्णय लिया। वे अनन्त भगवान से क्षमा मांगने हेतु वन में चले गए। उन्हें रास्ते में जो मिलता वे उससे अनन्तदेवका पता पूछते जाते थे। बहुत खोजने पर भी कौण्डिन्य मुनि को जब अनन्त भगवान का साक्षात्कार नहीं हुआ तब वे निराश होकर प्राण त्यागने को उद्यत हुए। तभी एक वृद्ध ब्राह्मण ने आकर उन्हें आत्महत्या करने से रोक दिया और एक गुफामें ले जाकर चतुर्भुज अनन्तदेवका दर्शन कराया।
भगवान ने मुनि से कहा.तुमने जो अनन्तसूत्रका तिरस्कार किया है यह सब उसी का फल है। इसके प्रायश्चित हेतु तुम चौदह वर्ष तक निरंतर अनन्त.व्रत का पालन करो। इस व्रत का अनुष्ठान पूरा हो जाने पर तुम्हारी नष्ट हुई सम्पत्ति तुम्हें पुन:; प्राप्त हो जाएगी और तुम पूर्ववत् सुखी.समृद्ध हो जाओगे। कौण्डिन्य मुनि ने इस आज्ञा को सहर्ष स्वीकार कर लिया। भगवान ने आगे कहा.जीव अपने पूर्ववत् दुष्कर्मो का फल ही दुर्गति के रूप में भोगता है। मनुष्य जन्म-जन्मांतर के पातकों के कारण अनेक कष्ट पाता है। अनन्त.व्रत के सविधि पालन से पाप नष्ट होते हैं तथा सुख.शांति प्राप्त होती है। कौण्डिन्यमुनि ने चौदह वर्ष तक अनन्त.व्रत का नियमपूर्वक पालन करके खोई हुई समृद्धि को पुन; प्राप्त कर लिया।
अब यहां एक प्रश्न और उठता है कि अनंत सूत्र है क्या, तोे इस संबंध में बताया गया है कि अनंत चतुर्दशी के दिन पूजा के लिए एक खास धागा होता है जिसे अनंत सूत्र कहते हैं। ये धागा चौदह गांठों वाला होता है जो भगवान विष्णु के चौदह लोकों का प्रतीक है। हिन्दू धर्म शास्त्रों के अुनसार ये चौदह गांठों वाला अनंत सूत्र 14 लोकों ; भूर्लोक,  भुवर्लोक,  स्वर्लोक,  महर्लोक,  जनलोक,  तपोलोक,  ब्रह्मलोक,  अतल,  वितल,  सतल,  रसातल,  तलातल,  महातल और पाताल लोक का प्रतीक होते हैं। इसलिए इसे बांधना शुभ माना जाता है। इसके अलावा अनंत चतुर्दशी के दिन बांधें जाने वाले रक्षासूत्र की 14 गांठे भगवान विष्णु के 14 रूपों ;अनंत, ऋषिकेश,  पद्मनाभ,  माधव,  वैकुण्ठ,  श्रीधर,  त्रिविक्रम,  मधुसूदन,  वामन,  केशव,  नारायण,  दामोदर और गोविन्द का प्रतीक भी मानी जाती है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार अनंत चतुर्दशी के दिन पूजा के बाद इस धागे को बाजू में बांधने से व्यक्ति को भय से मुक्ति मिलती है, और पाप नष्ट होते हैं। जो व्यक्ति 14 वर्ष तक अनंत चतुर्दशी का व्रत करता है और चौदह गांठ वाले इस अनंत सूत्र को बांधता है उसे भगवान विष्णु की कृपा से बैकुंठ की प्राप्ति होती है। अनंत सूत्र को महिलाएं अपने बाएं हाथ की बाजू में और पुरुष दाहिने हाथ की बाजू में बांधते हैं।

Leave A Reply

Your email address will not be published.