स्वपन होते फागुन के गीत, जोगीरा, चैतावर और धमार

नई दिल्ली। मशहुर कवि डा. दयाशंकर पांडेय ने कभी लिखा था ‘पथ रहे पहचान के बस हम अपरिचित हो गए, है, नगर अपना वही बस भीड में हम कहीं खो गए‘। कवि की इस व्यथा को जब हम सुनते हैं तो मुझे याद आते हैं वो दिन जब बसंत पंचमी से शुरू होकर चैत माह के आगमन तक ढोलक, झाल, झांझ और करताल जैसे वाद्य यंत्रों की सुमधुर ध्वनि के बीच होली से लेकर चैतावर तक सुनने को मिलता था।
गांव के गली चौक चौराहों पर इन वाद्य यंत्रों के साथ जब लोगों को टोलियां अपना तान छेडती थी तो वहां से गुजरनेवाले लोग भी कुछ पल के लिए रूक कर इसका मधुर आनंद लिया करते थे साथ ही इसमें अपनी सहभागिता भी देने से नहीं चुकते थे। फागुन के गीत, जोगीरा, चैतावर, धमार इत्यादि के माध्यम से रात परवान चढ़ती थी। नि:शब्द रात्रि में उठती वाद्य यंत्रों की धुन के साथ गवैयों की सुमधुर आवाज होली के आगमन का एहसास कराती रहती थी। होली के दिन यह टोली गांव के हर दरवाजे पर पहुंच कर होली गीतों का रसास्वादन कराती थी। लोग इस मंडली के लिए शर्बत, पकवान, भांग इत्यादि की व्यवस्था विशेष रूप से रखते थे।इन होली के गीतों के माध्यम से लोगों को दुआएं दी जाती थी साथ ही कामना की जाती थी कि परिवार कुशल पूर्वक रहे। इन्हीं गीतों में से एक है ‘सदा आनंद रहे एहि दुआरी मोहन खेले होली रे।‘
बदलते समय के साथ अब इसका रंग फीका होने लगा। किसी विद्वान ने सच ही कहा था कि जब भी विज्ञान ने प्रगति की है संस्कृति के फन को कुचलने का प्रयास किया है। आज यही स्थिति है। आज डेक का जमाना हो गया मोवाइल का जमाना हो गया अब लोग होली के गीत सुनते भी हैं तो इन्हीं सवों पर। अभी वर्तमान की बात की जाय तो हम पाते हैं कि अब तो न लोगों के पास बरामदा है और न ही खुली जगह जहां दस बीस लोग जमा होकर होली गा सकें। हां इतना जरूर है कि हम अपने बालकोनी से किसी के कमरे से आती होली के गीत का आनंद उठा लेते हैं। याद होगा जब बारिश होती थी तो लोग घरों से बाहर वारिश का आनंद उठाने के लिए खेतों की ओर बगीचे की ओर भागते थे आज हम बालकोनी में भागते हैं वो भी सिर्फ इसलिए कि कपडे गिले ना हो जाए। अब तो लोगा बारिश का आनंद भी टीवी पर या फिर अप्पू घर में जाकर लेते हैं।
चंदौली के नरोत्तम यादव जिनकी मयूर विहार फेज थ्री मे चाय की दुकान है बताते हैं कि आज जो भी होली गीत टीवी आदि पर सुनने को मिलता है उसमें वो मिठास नहीं जो गांव की टोलियों के द्वारा गाए गए गीतों में हुआ करती थी।एक जमाना था जब बुजुर्गों की टोली गांव के दरवाजे. दरवाजे घूम होली गाती थी तो एक दूसरे से हंसी, ठिठोली किया करती थी। लोग इस बात का भी ख्याल रखते थे कि गांव में किसी का घर छुटे ना। हर घर के मालिक को इस बात का इंतजार रहता था कि उनके दरवाजे टोलियां आएंगी और अपने गीतों के माध्यम से दुआएं देंगी। होली आने के पहले से लोग जोगीरा आदि गाने की तैयारी के साथ ही वाद्य यंत्रों को भी दुरूस्त कर लिया करते थे। एक नई उमंग होती थी और अपनापन का एहसास। परंतु आज इन सब चीजों की कमी हो गई। नतीजा यह हुआ कि लोगों में अपनापन की जो भावना थी, एक दूसरे के कद्र की बात थी, गांव के बडे बुजुर्गो का जो सम्मान था वो भी लुप्त होने लगा है। श्री नरोत्तम यह कहते हैं कि हमारी पीढी तो गुजर गई अब आनेवाली पीढी क्या जानेगी फगुआ, चैतावर। बडे ही दुख के साथ नरोत्तम कहते हैं मनुष्य कितना भी बडा क्यों न हो जाए अपनी संस्कृति, परंपरा, खान पान वेशभूषा को नहीं छोडे।
