जानें टैरो कार्ड का इतिहास
वैदिक ज्योतिष में जिस तरह से किसी व्यक्ति का भविष्य जानने के लिए जन्म कुंडली, हस्तेरखा और अंकज्योतिष का अध्ययन करते हैं उसी प्रकार से आधुनिक युग में इन सभी विधाओं में एक और प्रचलित विधा है जिसे टैरो कार्ड रीडिंग कहा जाता है। टैरो कार्ड रीडिंग में टैरो कार्ड के ऊपर अंक, रंग, संकेत तथा पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश जैसे पांच तत्व दर्शाए गए होते हैं जिनके आधार पर भविष्य का अनुमान लगाया जाता है और जीवन में आने वाली तमाम तरह की बाधाओं को हल करने में यह विद्या काम आती है।
अगर हम जब टैरो कार्ड के इतिहास की बात करें तो ज्योतिष की इस विधा की शुरुआत लगभग 2 हजार साल पहले हुई थी। सेल्टिक नामक देश के लोगों द्वारा सर्वप्रथम इस विद्या से भविष्य जानने का प्रयास किया जाता था। मान्यताओं के अनुसार यह विद्या 1971 से अधिक प्रचलन में आई जब इटली में मनोरंजन के माध्यम के तौर पर अपनाया गया था। इसके बाद टैरो कार्ड रीडिंग की यह विद्या इंग्लैंड व फ्रांस में भी बहुत लोकप्रिय हो गई। वर्तमान समय में टैरो कार्ड रीडिंग का प्रचलन भारत में काफी बढ़ चुका है।
माना जाता है कि 1971 से पहले टैरो कार्ड सिर्फ सामान्य पत्ते खेलने के लिए प्रयोग किये जाते थे। इसके बाद इनका प्रयोग ज्योतिष और भविष्य को जानने के लिए किया जाने लगा। टैरो कार्ड के अंतर्गत दो लोगों का होना अनिवार्य है। प्रथम प्रश्नकर्ता और दूसरा रीडर। इस विधा में जो व्यक्ति प्रश्नकर्ता होता है वही कार्ड को फेंटता है। इसके पश्चात कार्ड रीडर इन कार्ड्स को एक नियमित क्रम देता है। तत्पश्चात प्रत्येक कार्ड से एक के बाद एक क्रम से भविष्य में होने वाली घटनाओं का उत्तर देता है। कार्ड रीडर पहले कार्ड में निहित अर्थ को स्वयं समझता है फिर प्रश्नकर्ता के प्रश्नों का उत्तर देता है। ज्योतिष की यह विद्या आस्था और विश्वास पर आधारित है। यदि प्रश्नकर्ता को इस विद्या पर विश्वास नहीं है तो उसे इसका प्रयोग नहीं करना चाहिए। इस विद्या को कुछ लोग अविश्वास की नजरों से देखते हैं परन्तु इस बात में कोई संदेह नहीं है कि टैरो कार्ड विद्या का प्रयोग भविष्य को जानने के लिए किया जा सकता है।
