पिंडदान के लिए गया का स्थान सर्वोपरि क्यों ?
पं. विजेंद्र मिश्र
देशभर में श्राद्ध कर्म और पिंडदान के लिए 55 स्थानों को महत्वपूर्ण माना गया है, जिसमें बिहार के गया का स्थान सर्वोपरि माना गया है। गया में श्राद्ध कर्म, तर्पण विधि और पिंडदान करने के बाद कुछ भी शेष नहीं रह जाता है और यहां से व्यक्ति पितृऋण से मुक्त हो जाता है। गया का महत्व इसी से पता चलता है कि फल्गु नदी के तट पर माता सीता ने राजा दशरथ की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए श्राद्ध कर्म और पिंडदान किया था। ऐसा तब हुआ था जब भगवान राम लक्ष्मण आवश्यक सामग्री लाने गए थे। इस बात का जिक्र मान्यताओं और वाल्मीकि रामायण में किया गया है। राजा दशरथ की आत्मा ने सीताजी को प्रकट होकर समय से पहले पिंडदान करने का आग्रह किया क्योंकि राम और लक्ष्मण सामग्री लेने गए थे। सीताजी के पास उस समय पिंडदान के लिए कोई सामग्री नहीं थी इसलिए उन्होंने फाल्गु नदी के किनारे से बालू (रेत) का पिंड बनाया और राजा दशरथ की आत्मा की मोक्ष के लिए पिंडदान किया जिससे राजा दशरथ को मोक्ष की प्राप्ति हुई।
इसके साथ ही महाभारत काल में पांडवों ने भी इसी स्थान पर श्राद्ध कर्म किया था। इस बात की जिक्र पुराणों में मिलता है। वायु पुराण, गरुड़ पुराण और विष्णु पुराण में भी गया शहर का महत्व बताया गया है। इस तीर्थ पर पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है इसलिए गया को मोक्ष की भूमि अर्थात मोक्ष स्थली कहा जाता है। गया शहर में हर साल पितृपक्ष के दौरान एक बार मेला लगता है जिसे पितृपक्ष का मेला भी कहा जाता है। पौराणिक कथा है कि गयासुर नामक एक असुर ने कड़ी तपस्या की थी और ब्रह्माजी से वरदान मांगा था। गयासुर ने ब्रह्माजी से वरदान मांगा था कि उसका शरीर पवित्र हो जाए और लोग उसके दर्शन कर पाप मुक्त हो जाएं। इस वरदान के बाद लोगों में भय खत्म हो गया और पाप करने लगे। पाप करने के बाद वह गयासुर के दर्शन करते और पाप मुक्त हो जाते थे। ऐसा होने से स्वर्ग और नरक का संतुलन बिगड़ने लगा। बड़े-बड़े पापी भी स्वर्ग पहुंचने लगे। इन सबसे बचने के लिए देवतागण गयासुर के पास पहुंचे और यज्ञ के लिए पवित्र स्थान की मांग की। गयासुर ने अपना शरीर ही देवताओं को यज्ञ के लिए दे दिया और कहा कि आप मेरे ऊपर ही यज्ञ करें। जब गयासुर लेटा तो उसका शरीर पांच कोस में फैल गया और यही पांच कोस आगे चलकर गया बन गया। गयासुर के पुण्य प्रभाव से वह स्थान तीर्थ के रूप में जाना गया। गया में पहले विविध नामों से 360 वेदियां थी लेकिन अब केवल 48 ही शेष बची हैं। गया में भगवान विष्णु गदाधर के रूप में विराजमान हैं। गयासुर के विशुद्ध शरीर में ब्रह्मा, जनार्दन, शिव तथा प्रपितामह निवास करते हैं इसलिए पिंडदान व श्राद्ध कर्म के लिए इस स्थान को उत्तम माना गया है।
